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खुद बेहिसाब शादिया करने वाले क्रूर सम्राट अकबर ने अपनी बेटियों को जीवन भर रखा कुंवारा,क्या थी वजह जानिए

मित्रों वैसे तो इतिहास से जुड़ी ऐसी कई घटनाये है जिनके संबंध में हम लोगों पता भी नही होगा। कई ऐसी ऐतिहासिक कहानियां है, जिनसे आज भी हम लोग अनजान है। आपको बता दें कि कई ऐसे शासक रहे है, जो भारत पर अपना आधिपत्य जमाने के लिये न जाने कितने युद्ध किये। तो वही कई ऐसे भी शासक रहे जो अपने क्रूर स्वाभाव के लिये ही जाने जाते थे। पर आज हम मुगलवंश के शासक अकबर को लेकर एक खास जानकारी देने वाले है, क्योंकि मिली जानकारी के मुताबिक अकबर ने अपनी बेटियों को कुवांरी रखा था। जिसको लेकर लोगों में आज भी सवाल उठते रहते है। आइए जाने आखिर इसके पीछे का कारण क्या था?

आपको शायद पता होगा कि अकबर ने अपनी हर एक बेटी को कुंवारी क्यों रखा, जानिए इसके पीछे का कारण।

दरअसल इस बात में तो कोई दो राय नही है कि अकबर मुगल वंशज का एक महान शासक था। जी हां, वह न केवल बहादुर था बल्कि सभी धर्मों को मानने वाला राजा भी था। अकबर के माता-पिता कहां थे सभी मुस्लिम, उन्होंने एक हिंदू रानी से भी शादी की, यानी उन्होंने रानी जोधा से शादी की। लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि उसने इतिहास में कई राजाओं को हराया, यही कारण है कि सम्राट अकबर भी अपनी शक्ति के लिए जाने जाते थे। सम्राट अकबर ने भी भारत के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वैसे अकबर हमेशा सम्मान और गर्व के साथ जीने वाले  राजा थे। ऐसे में उन्हें किसी के सामने झुकना पसंद नहीं था। वहीं बादशाह अकबर ने उन्हें बहुत सम्मान दिया, लेकिन फिर भी आपको जानकर हैरानी होगी कि उन्होंने अपनी तीन बेटियों को जीवन भर कुंवारी रखा। आपको यह सुनकर आश्चर्य हो सकता है, लेकिन यह सच है। विशेष रूप से, जब अकबर की बेटियां छोटी थीं और शादी के योग्य थीं, तो उन्होंने सोचा कि उन्हें अपनी बेटी की शादी के लिए दूल्हे और उसके पिता को अपना सिर झुकाना होगा। ऐसे में, अकबर ने अपनी तीन बेटियों के सम्मान को बनाए रखने के लिए जीवन भर कुंवारी के रूप में रखा ताकि भविष्य में उन्हें कभी किसी के सामने झुकना न पड़े। उन तीन बेटियों के कक्ष में प्रवेश करने की अनुमति नहीं थी।

आपको बता दें कि न केवल अकबर बल्कि उनके वंशजों ने भी इस नियम का पालन किया और उन्होंने अपनी बेटियों को जीवन भर के लिए कुंवारी बना दिया। अब आप उनके पिता के प्यार और उनकी भावनाओं को कह सकते हैं। हां, क्योंकि आज के समय की बात करें तो आज शायद ही कोई पिता होगा जिसने अपनी बेटी को पूरे जिन्दगी  घर पर रखा हो या उसकी देखभाल की हो। हालांकि, आजकल लड़कियों के पास ताकत है। अपने पैरों पर खड़े होकर अपने फैसले खुद लेते हैं, लेकिन जब शादी की बात आती है तो सब कुछ मां-बाप के मुताबिक ही होता है। शायद यही कारण है कि इतिहास में सम्राट अकबर के फैसले को उनकी बेटियों ने शांति से स्वीकार किया था। उनका शासन काल 18 से 1908 तक था। कई सैन्य जीत हासिल करने के बाद, उन्होंने देश के अधिकांश हिस्से को संगठित किया और राजनीतिक, प्रशासनिक, आर्थिक और धार्मिक सहिष्णुता और एकीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति की। उन्होंने ग्यारह शादियां की थीं। अकबर के दादा बाबुरी 18 वीं में वह अफगानिस्तान से अपनी सेना के साथ हिंदुस्तान पहुंचा और राणा संग्राम सिंह को हराकर आगरा के सिंहासन पर कब्जा कर लिया और हिंदुस्तान में मुगल सल्तनत की स्थापना की। उन्होंने अपनी आत्मकथा तुजु-के-बाबरी लिखी जिसका भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान है। हुमायूँ को 120 ईस्वी में कन्नौज की लड़ाई में शेर शाह सूरी ने हराया था, जो हुमायूँ के 18 साल के भटकने और कठिन जीवन की शुरुआत का प्रतीक था। इसी बीच 191 में उनकी मुलाकात सिंध के अमरकोट गांव के पास अपनी बेगम हमीदाबानू से हुई और 191 में उन्होंने हमीदाबानू से शादी कर ली।

आपकी जानकारी के लिये बता दें कि 191 में उनका बदरुद्दीन नाम का एक बेटा हुआ लेकिन हुमायूँ ने अपने बेटे का नाम बदलकर जलालुद्दीन मोहम्मद रख लिया। हुमायूँ को हमले से बचाने के लिए वह अपनी पत्नी के साथ ईरान भाग गया और जलालुद्दीन को अपने चाचाओं के संरक्षण में रहना पड़ा। वह पहले कुछ दिन कंधार में रहा और फिर काबुल में, और 19 के बाद से हुमायूँ के काबुल में अपने भाइयों के साथ संबंध बहुत अच्छे नहीं थे, हालाँकि जलालुद्दीन की हालत एक कैदी की तुलना में थोड़ी बेहतर थी जब उसने फिर से काबुल पर अपना झंडा फहराया, अकबर अपने पिता के बचाव में आया। लेकिन 13 साल की छोटी सी अवधि में अकबर के चाचा कामरान ने काबुल पर फिर से अधिकार कर लिया। अकबर अपने माता-पिता के संरक्षण में रहा। अकबर की उचित शिक्षा के लिए हुमायूँ ने मुल्ला इसामुद्दीन इब्राहिम, मौलाना अबुल कादिर, मीर अब्दुल लतीफ आदि को उस समय का एक प्रसिद्ध मुस्लिम विद्वान नियुक्त किया। इस मामले की सच्चाई यह है कि उसने खुद कभी कुछ नहीं लिखा। हुमायूँ के अपने खोए हुए को वापस पाने के अथक प्रयास राज्य अंततः सफल रहा और वह 18 ईस्वी में भारत पहुंचा। 9 जनवरी, 18 को दिल्ली के एक महल की सीढ़ियों से गिरकर दुर्घटनावश हुमायूँ के पिता की मृत्यु हो गई। उस समय अकबर के साथ पंजाब के गुरदासपुर के कलनौर गांव में वजीर बैरमखान भी थे। उस समय मुगल साम्राज्य काबुल से दिल्ली तक फैला हुआ था और हेमू के नेतृत्व में अफगान सेना को पुनर्गठित करना एक चुनौती थी। इस जानकारी के संबंध में आप लोगों की क्या प्रतिक्रियायें है। मित्रो अधिक रोचक बाते व लेटेस्ट न्यूज के लिये आप हमारे पेज से जुड़े और अपने दोस्तो को भी इस पेज से जुड़ने के लिये भी प्रेरित करें।

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