जब रफ़ी ने नाराज़ होकर B.R चोपड़ा ने किया था एलान कि 'मैं दूसरा मुहम्मद रफ़ी पैदा कर दूंगा' - onlyentertainmentnews
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जब रफ़ी ने नाराज़ होकर B.R चोपड़ा ने किया था एलान कि ‘मैं दूसरा मुहम्मद रफ़ी पैदा कर दूंगा’

मित्रों इसमे कोई दो राय नही है कि हमारी बॉलीवुड इंड्रस्टी में बहुत सी फिल्मों का दौर रहा है और पहले के दशक से लेकर आज तक बहुत सी फिल्में हमे देखने को मिली है और उन फिल्मों को देखकर हमे काफी मनोरंजन मिला है। वहीं अगर बात की जाये इन फिल्मों के गानों की तो आपको तो पता ही है कि बिना गाने के कोई फिल्म हो ही नही सकती है क्योंकि गाने ही पूरी फिल्म की जान है, और इन फिल्मों में जान डालने का काम गायकों का है। वैसे तो हमारे बॉलीवुड में बहुत से प्रख्यात गायक हुये जिन्होने अपने गायन से हम लोगों का मन-मुग्द कर दिया है। वहीं उनमे सबसे प्रख्यत गायक मोहम्मद रफी हुये है जिनको लेकर बी0आर0 चोपड़ा ने कह दी थी इतनी बड़ी बात, जिसे सुन आप लोग भी सोच में पड़ जायेगें।

दरअसल बी0आर0 चोपड़ा के मन में कहीं फ़िल्ममेकर बनने का ख़्वाब पनप रहा था, दिल्ली से बोरिया-बस्ता उठाकर बॉम्बे पहुंच गए, वहां लाहौर के कुछ दोस्त पहले से थे, एक नई फ़िल्म शुरू की ‘करवट’, सुपर फ्लॉप, अब क्या करते! अपनी कहानियां लेकर इधर-उधर घूमा करते, फ़िल्म में कोई पैसा लगाने को तैयार नहीं था, ऐसे में उनकी मुलाक़ात हुई प्रोड्यूसर शादीलाल हांडा से, उन्होंने चोपड़ा से कहा : यार चोपड़ा तू क्या कर रहा है?

चोपड़ा: क्या करूं, बेकार आदमी हूं,  जो मेरे दोस्त हैं, उनके पास भी मैं नहीं जाता, मैं सोचता हूं, लाहौर से टूटकर आया हूं, रिफ़्यूजी क्या किसी का करेगा!  क्या किसी से मांगेगा। हांडा: मैं तुझसे कहता हूं चोपड़ा,  तू फ़िल्म बना, मैं पैसा लगाऊँगा, चोपड़ा: सोचके लगाना, मेरे पास वापस करने को कुछ नहीं है, चोपड़ा ने स्टोरी सुनाई,  हांडा को बेहद पसंद आई, चोपड़ा पूछ बैठे: लोग तो कहते हैं स्टोरी आज के मतलब की नहीं हैं, मैं ठहरा एक जर्नलिस्ट, मैं चाहता हूं कोई ऐसी फ़िल्म बनाऊं, जिसमें समाज का कुछ लेन-देन हो, पर लोग कहते हैं ये बेकार कहानी है, हांडा ने चोपड़ा को आश्वस्त किया, पर उनके सामने एक शर्त रखी, चोपड़ा चाहते थे कि इस फ़िल्म को कोई और डायरेक्ट करे, हांडा ने जिद पकड़ ली कि इसे अगर वो डायरेक्ट करेंगे, तभी फ़िल्म में पैसा लगाएंगे, चोपड़ा भी मजबूर थे, फ़िल्म न डायरेक्ट करते तो पैसे हाथ से जा रहे थे, उनके पास और कोई चारा नहीं था, उन्होंने फ़िल्म डायरेक्ट की ‘अफसाना’, फ़िल्म हिट, चोपड़ा सुपर हिट, वो कहते हैं। जानकारी के लिये बताते चले हि चोपड़ा साहब की पहली सफल फ़िल्म ‘अफसाना’ में दादा मुनि यानी अशोक कुमार ने डबल रोल किया था, इसी का एक सीन शूट होना था, चोपड़ा साहब ने अशोक कुमार से उनकी ऐक्टिंग को लेकर बात की, वो कुछ बदलाव चाहते थे, पर दादा मुनि ने इसे अपनी ईगो पर ले लिया, उन्हें लगा कि चोपड़ा पूरी यूनिट के सामने अपना रौब दिखाना चाहते हैं, वो नहीं माने, तब बी आर ने एक रास्ता निकाला, अशोक कुमार से कहा गया कि इस सीन के दो वर्जन शूट करते हैं, जो अच्छा लगेगा, फ़िल्म में डाला जाएगा, दोनों वर्जन शूट हुए, एक जैसा अशोक कुमार कर रहे थे और दूसरा जैसा चोपड़ा साहब चाहते थे, रील देखी गयी, खुद अशोक कुमार को चोपड़ा वाला वर्जन ज़्यादा अच्छा लगा, उन्होंने माफ़ी मांगते हुए कहा: चोपड़ा तुम अब जैसा कहोगे, आगे से वैसा ही होगा।

1955 में चोपड़ा ने अपना प्रोडक्शन हाउस खोल दिया: बी आर फिल्म्स, इसके बैनर तले फ़िल्म बनायी, ‘नया दौर’, फ़िल्म में दिलीप कुमार और वैजयंती माला ने मुख्य भूमिकाएं निभाई, इस फ़िल्म ने बी आर चोपड़ा के करियर और बी आर फिल्म्स दोनों को आकाश की बुलंदियों पर पहुंचा दिया, उन्होंने कई प्रतिभाओं को भी आकाश की बुलंदियों पर पहुंचने का मौक़ा दिया, उन्हीं में से एक थीं आशा भोंसले, उनका करियर संवारने में चोपड़ा साहब की अहम भूमिका रही, पचास के दशक में जब आशा को केवल बी और सी ग्रेड फ़िल्मों में ही गाने का मौका मिला करता था, उस समय बी आर चोपड़ा ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और ‘नया दौर’ में गाने का मौका दिया, यह फ़िल्म आशा भोंसले के करियर की पहली सुपरहिट फ़िल्म साबित हुई।

उड़े जब-जब जुल्फें तेरी, कंवारियों का दिल मचले… इसके बाद तो एक सिलसिला चला, ‘वक़्त’ ‘गुमराह’, ‘हमराज’, ‘आदमी और इंसान’, आशा स्टार बन गईं, शुरुआती दिनों में रफ़ी साहब बी आर चोपड़ा की फिल्मों में आवाज़  दिया करते थे, उदाहरण के लिए ‘नया दौर’ को ही लें ले, पर बाद के दिनों में कुछ ऐसा हुआ कि रफ़ी को यश चोपड़ा से अलग होना पड़ा, कहते हैं चोपड़ा ने एक बार रफ़ी साहब से कहा: अब आप सिर्फ़ बी आर फिल्म्स के लिए ही गाने गाएंगे, रफ़ी ने साफ़ इनकार कर दिया, उन्होंने कहा: आप मुझे बांध नहीं सकते, यह आवाज़ ऊपर वाले की देन है, जो बुलाएगा उसकी फ़िल्म में गाऊंगा, चोपड़ा ने ये बात दिल पर ले ली, ‘अब तुम्हें मेरी किसी फ़िल्म में गाने का मौक़ा नहीं मिलेगा’, साथ ही दूसरे प्रोड्यूसर्स से भी रफ़ी को काम देने से मना कर दिया, और बोले: मैं दूसरा मोहम्मद रफ़ी पैदा कर दूंगा,  उन्होंने कोशिश भी की।

महेंद्र कपूर को उनके बरअक्स खड़ा करने का जतन किया, रफ़ी साहब को टक्कर देना तो मामूली बात नहीं, पर चोपड़ा और रफ़ी के झगड़े का महेंद्र कपूर को फायदा मिला, उन्होंने बी आर फिल्म्स के लिए खूब गाने गाए, उनका करियर जमकर चमका, संगीतकार रवि ने चोपड़ा साहब के साथ कई फिल्में कीं, वो रफ़ी साहब को बहुत पसंद करते थे, वो चाहते थे कि रफ़ी वापस लौटें, पर चोपड़ा अड़े रहते, कई सालों बाद यश चोपड़ा ने एक फ़िल्म बनायी ‘वक़्त’, उन्होंने अपने भाई को मनाया, बी आर चोपड़ा माने, और रफ़ी साहब ने उस फ़िल्म में गाना गाया: वक़्त की हर शै गुलाम, वक़्त का हर शै पे राज – बी आर चोपड़ा की ‘नया दौर’ से एक किस्सा बहुत मशहूर है, ‘नया दौर’ का इनडोर शूट शिड्यूल पूरा हो चुका था, अब बी आर चोपड़ा आउटडोर शूटिंग के लिए भोपाल से सटे ग्रामीण इलाके बुधनी में जाने की तैयारी कर रहे थे, मगर मधुबाला के पिता ने अपनी बेटी को वहां भेजने से मना कर दिया, चोपड़ा साहब ने मधुबाला के पिता को बहुत मनाया मगर वो नहीं माने, उनका मानना था कि आउटडोर शूट पर मधुबाला और दिलीप कुमार क़रीब आ जाएंगे।

चोपड़ा साहब गुस्सा हो गए, उन्होंने मधुबाला की जगह वैजयंती माला को फिल्म में ले लिया, अब क्या! मधुबाला के पिता ने उनके खिलाफ केस कर दिया, जिस कारण उन्हें महीनों कोर्ट के चक्कर काटने पड़े, इस किस्से का एक वर्जन ये भी है कि बी आर चोपड़ा ने नाराज़ होकर मधुबाला पर केस कर दिया था, ना कि मधुबाला ने चोपड़ा साहब पर, बी आर अपने छोटे भाई यश चोपड़ा को बहुत मानते थे, 1951 में यश उन्हें असिस्ट करने बॉम्बे आ रहे थे, तो उनकी माँ ने एक चिट्ठी लिख भेजी, जिसमें बी आर चोपड़ा को संबोधित करते हुए उन्होंने लिखा: चोपड़ा साहब के मन में कहीं न कहीं ये बात दबी थी, और उन्होंने ‘धूल का फूल’ से यश को इंडस्ट्री में लॉन्च किया, इस फ़िल्म के बारे में कहा जाता है कि इसकी थीम के चलते इससे वितरकों ने हाथ खींच लिए, फिर भी चोपड़ा जिद पर अड़े रहे, यह फ़िल्म उनकी भावनाओं से जुड़ी थी, इससे उनका छोटा भाई डायरेक्टोरियल डेब्यू करने जा रहा था, कुछ न कुछ जतन करके उन्होंने फ़िल्म बनाई और अपने भाई को बड़ा आदमी बनाने की तरफ़ पहला क़दम बढ़ाया, ‘धूल का फूल’ में एक रोल के लिए पहले राजकुमार को साइन किया गया था, राजकुमार ने शर्त रखी कि शूट के दौरान हमेशा बी आर चोपड़ा को सेट पर मौजूद रहना होगा, बी आर चोपड़ा को बात नहीं जमी, उन्होंने राजकुमार को बाहर का रास्ता दिखाया और अशोक कुमार को फ़िल्म में साइन कर लिया, ‘वक़्त’ और ‘दाग’ जैसी फिल्मों ने यश को बॉलीवुड में स्थापित कर दिया था, कहते हैं जब अपनी शादी के बाद यश हनीमून से लौटे, तो बी आर चोपड़ा से बिना बताए, 1970 में यशराज फिल्म्स की घोषणा कर दी, इस पर चोपड़ा टूट गये,  वो 6 महीने बिस्तर पर रहे, तीन दिनों तक उन्होंने खाना नहीं खाया।

हालांकि बाद में यशराज फिल्म्स और बी आर फिल्म्स ने एक साथ कई फिल्में प्रोड्यूस कीं, एक बार किसी विदेशी फ़िल्म निर्देशक ने बी आर चोपड़ा को ललकार दिया था, चोपड़ा साहब किसी फ़िल्म फेस्टिवल को अटेंड करने विदेश गये थे, उनसे वहां एक डायरेक्टर ने कहा: हिन्दुस्तानी सिनेमा सिर्फ़ नाच-गाने और ड्रामेबाजी है, बिना गानों के भारतीय सिनेमा का अस्तित्व ही नहीं है, बीआर चोपड़ा ये कैसे मान लेते! उन्होंने कहा: चैलेंज एक्सेप्टेड और एक प्रयोग किया, बना डाली एक बिना गानों की फ़िल्म ‘कानून’, जो उस समय एक अजूबा थी, क्योंकि वो बॉलीवुड का एक ऐसा दौर था, जिसमें  बिना गानों की फ़िल्म को स्वीकार नहीं किया जा सकता था, पर बी आर तो ‘चोपड़ा’ थे, उन्होंने फ़िल्म बनाई और फ़िल्म चली भी, अशोक कुमार और बी आर चोपड़ा बहुत अच्छे दोस्त थे, चोपड़ा साहब उनके भाई किशोर कुमार को एक फ़िल्म में लेना चाहते थे, किशोर से बी आर मिलने पहुंचे, किशोर कुमार काम करने को राजी भी हो गए, पर चोपड़ा के सामने एक शर्त रख दी, चोपड़ा साहब, दौड़कर अशोक कुमार के पास गए, इस पर अशोक ने शर्त पूछने के तुरंत बाद किशोर को फोन लगाया और कहा: तुझे चोपड़ा जी की फिल्म में काम नहीं करना है क्या?

इस पर किशोर का जवाब था: मैंने मना नहीं किया, बस वो मेरी शर्त मान लें,  किशोर कुमार की शर्त थी कि बी आर चोपड़ा को धोती और उस पर जूते-मोज़े पहनकर आना होगा, और सबसे बड़ी शर्त: मुझे साइन करना है तो पान खाकर आइए, वो भी ऐसे कि लार टपकी हुई हो, जिससे आपका मुंह लाल-लाल नज़र आए, जबकि वो जानते थे कि चोपड़ा न तो धोती पहनते हैं और न ही पान खाते हैं,  दरअसल एक बार जब किशोर कुमार उनके पास काम मांगने गये थे, तो चोपड़ा ने उनके सामने कुछ शर्तें रखीं थी, तब किशोर ने कहा था: आज मेरा बुरा वक़्त है तो आप शर्त रख रहे हैं, जब मेरा वक़्त आएगा तो मैं भी आपके सामने शर्त रखूंगा, जब बॉलीवुड फिल्में बनाने के लिए कुछ गिने चुने विषयों पर निर्भर था, या तो अमीर बाप की बेटी को गरीब लड़के से प्यार हो जाता था, या फिर एक ऐसा हीरो जो सब कुछ करने में समर्थ है, अजेय है, यह फॉर्मूला हिट भी था, ऐसे समय में चोपड़ा ने रिस्क लिया और बी आर फिल्म्स के बैनर तले कई सोशल इशू सेंट्रिक फिल्में बनाईं, डायरेक्ट कीं, उनकी मूवीज सामाजिक और मानवीय समस्याओं पर आधारित होती थीं, जैसे, ‘एक ही रास्ता’ विधवा विवाह पर, मैन और मशीन के कान्फ्लिक्ट पर ‘नया दौर’, नाजायज़ बच्चे की समस्या पर ‘धूल का फूल’, वेश्यावृत्ति पर ‘साधना’ और एक अपने समय से आगे की फ़िल्म ‘कानून’, जिसमें उन्होंने अबॉलिशन ऑफ कैपिटल पनिशमेंट का मुद्दा उठाया, वो कहते थे: पत्रकार होने के नाते, मैं हमेशा सोचता हूं कि किसी फ़िल्म में किस तरह से कोई सोशल कंटेन्ट हो सकता है, यह फ़िल्म को एक थर्ड डाइमेंशन देने का काम करता है, उन्होंने भारतीय दर्शकों की नब्ज़ को पहचाना और छोटे पर्दे का रुख किया, और फिर बना भारतीय टीवी इतिहास का सफलतम शो, ‘महाभारत’, जिसके लिए वो कहते हैं।

महाभारत वॉज़ दी क्रिएशन ऑफ गॉड, बाद के दौर में जब वो बड़े पर्दे की ओर लौटे, तो ‘बागबान’ लिखी, जो भारतीय बेटों के लिए काल बन गई, चोपड़ा साहब को दादा साहब फाल्के बहुत बाद में मिला, जब वो क़रीब 85 साल के हो गये, वो कहते थे कि इससे पहले के सालों में उनसे कई बार वादा किया गया कि तुम्हें अवॉर्ड मिलेगा, पर हर बार बात झूठी साबित होती, एक बार तो अशोक कुमार ने, जो खुद ज्यूरी मेम्बर थे, फोन करके कहा: चोपड़ा मैं ज्यूरी में था, तेरा नाम बहुमत से पास हुआ है, उसके बाद एक बार फ़िल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया से फोन आया कि उन्हें इस साल का दादा साहब मिलेगा, पर उस साल गौड़ा साहब ने अपने कर्नाटक के ऐक्टर राजकुमार को अवॉर्ड दे दिया, चोपड़ा साहब कहते थे: मैंने उम्मीद छोड़ दी थी, अब मुझे क्या मिलेगा, जब इतने सालों में नहीं मिला, पर लंबे इंतज़ार के बाद 1998 में जब दादा साहब मिला तो मैं भावुक हो गया, उन्हें काम की भूख थी, सेट पर उनके प्राण बसते थे, वो जीवन के अंतिम समय तक फिल्मों से किसी न किसी तरह जुड़े रहे, एक बार उनसे किसी ने पूछा कि इतने बड़े करियर में ऐसा क्या बचा, जो आप करना चाहते थे, उन्होंने जवाब दिया: कुछ खास नहीं, बस मैं खाली नहीं बैठना चाहता, इस जानकारी के संबंध में आप लोगों की क्या प्रतिक्रियायें है। मित्रो अधिक रोचक बाते व लेटेस्‍ट न्‍यूज के लिये आप हमारे पेज से जुड़े और अपने दोस्तो को भी इस पेज से जुड़ने के लिये भी प्रेरित करें।

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