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7 साल की उम्र में ही चली गयी थी आंखों की रोशनी,फिर भी नही मानी हार और फिर

इरादे अगर पक्के हो तो अपनी मंजिल तक पहुँचने से कोई नही रोक सकता .बस उसके लिए करना पड़ता है कठिन परिश्रम . रास्ते में आने वाली हर समस्या हर परेशानी को नजरंदाज कर बस आगे बढ़ना है .इतना संघर्ष और मेहनत के बाद जब आप अपनी मंजिल पर पहुँचते हो वहा पहुँच कर मिलने वाले सुकून की बात ही कुछ और है . जो लोग हालातो और समस्याओ से नही डरते और आपने जीवन में आगे बढ़ते है ऐसे लोग ही कामयाब होते है .

आज हम आपको इस लेख के माध्यम से एक ऐसी लड़की के बारे में जानकारी देने जा रहे हैं जिसने अपने जीवन में बहुत कष्ट सहन किया है। तमाम परेशानियों को पार करते हुए वह IAS अफसर बनी है। दरअसल, हम आपको जिस लड़की के बारे में बता रहे हैं उसका नाम तपस्विनी दास है, जिसने 7 साल की उम्र में ही अपनी आंखों की रोशनी खो दी थी। डॉक्टर की गलती की वजह से उनकी सेकंड क्लास में ही आंखों की रोशनी चली गई थी परंतु इसके बावजूद भी उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी।

हालांकि तपस्विनी दास के लिए जीवन का यह सफर इतना आसान नहीं था परंतु उन्होंने कभी भी हिम्मत नहीं हारी। तपस्विनी दास ने ब्रेल लिपि, ऑडियो रिकॉर्डिंग से पढ़ाई की और अच्छे अंक के साथ वह सभी क्लास पास करती गईं। तपस्विनी एक मजबूत और हिम्मत वाली लड़की रही हैं। कभी भी वह अपने माता-पिता के ऊपर बोझ नहीं बनना चाहती थीं और उनके माता-पिता भी अपनी बेटी को बेटा से अधिक मानते हैं। तपस्विनी को खुद सहारे की आवश्यकता थी परंतु उन्होंने अपने मां-बाप को हमेशा सहारा दिया है।

आपको बता दें कि तपस्विनी दास के पिता जी का नाम अरुण कुमार दास है, जो उड़ीसा कॉपरेटिव हाउसिंग कॉरपोरेशन के रिटायर्ड डिप्टी मैनेजर हैं और उनकी माता जी का नाम कृष्णप्रिय मोहंती है, जो एक टीचर हैं। तपस्विनी के पिता जी अरुण कुमार का ऐसा बताना है कि तपस्विनी शुरू से ही पढ़ाई में बहुत ज्यादा होशियार थीं। 12वीं क्लास में भी टॉपर्स की लिस्ट में उनका नाम शामिल था। स्नातक परीक्षा में भी उनके अच्छे अंक आए थे।

जब तपस्विनी दास दूसरी कक्षा में पढ़ रही थीं तो उस समय के दौरान उनकी जिंदगी में अंधेरा छा गया था। साल 2003 में उड़ीसा के एक बड़े अस्पताल में डॉक्टर की लापरवाही की वजह से उनकी आंखों की रोशनी चली गई थी। तभी तपस्विनी ने यह ठान लिया था कि वह अपने नाम को सार्थक करेंगी। उन्होंने अपने जीवन में कुछ बड़ा हासिल करने का निश्चय कर लिया था। तपस्विनी दास का ऐसा बताना है कि साल 2003 कि उस भयानक आपबीती ने उनको पूरी तरह से तोड़ दिया। उनके माता-पिता काफी लंबे समय तक उन्हें लेकर काफी परेशान रहे। तपस्विनी के माता-पिता को यही चिंता लगी रहती थी कि अब उनकी बेटी क्या करेगी? कैसे पढ़ाई-लिखाई करेगी? और सबसे बड़ी चिंता उनकी शादी की थी।

तपस्विनी का हौसला मजबूत था और उनके दृढ़ निश्चय के आगे कोई भी कठिनाई बाधा नहीं बनी। वह अपने जीवन में कुछ बड़ा हासिल करने की सोच रही थीं। आंखों की रोशनी चले जाने के बाद तपस्विनी आम छात्रों की तरह पढ़ाई नहीं कर सकती थीं परंतु उन्होंने इस मुश्किल वक्त में अपने आप को संभाल लिया और ब्रेल लिपि से उन्होंने पढ़ाई की। मैट्रिक उन्होंने अच्छे अंको से पास कर ली।

तपस्विनी का कहना है कि दृढ़ निश्चय और धैर्य से सफलता हासिल की जा सकती है। उन्होंने सिविल परीक्षा भुवनेश्वर की उत्कल यूनिवर्सिटी से पॉलीटिकल साइंस में पोस्ट ग्रेजुएशन करते हुए पास की। जब उड़ीसा सिविल सर्विसेज एग्जाम का विज्ञापन उन्होंने देखा तो वह इस परीक्षा की तैयारी में जी तोड़ मेहनत करने लगी थीं। आंखों की रोशनी खोने के बाद भी तपस्विनी ने पहले ही प्रयास में उड़ीसा सिविल सर्विसेज परीक्षा 2018 में 161वीं रैंक हासिल की। उस समय के दौरान उनकी उम्र 23 साल की थीं। कठिन संघर्ष और अपनी मेहनत के बलबूते तपस्विनी दास IAS अधिकारी बन गईं।

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