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300 बीबियां होने के बाद भी नबाब को नहीं पहनाई किसी ने जूतियां, अंग्रेजो के हाथी गंवानी पड़ गयी जान

दोस्तों आज से पहले आपने इतिहास के बहुत से किस्से कहानिया सुनी और पढ़ी होगी .लेकिन आज हम आपको एक ऐसे नबाब के बारे में बताने वाले है .दो नही चार नही बल्कि कुल 300 बीबीया थी .जो एक छोटी से वजह से चढ़ गये थे अंग्रेजो के हत्थे .इनकी इतनी बीबियो में से इनकी एक बेगम ने अंतिम समय तक स्वाधीनता की जंग लड़ी. जिसे आज तक याद किया जाता है .

7 फरवरी के दिन का अवध के इतिहास से गहरा नाता है। 7 फरवरी 1856 को ब्रिटिश सरकार ने एक डिक्लेरेशन के जरिए अवध को अपने साम्राज्य में मिला लिया था। अवध के अंतिम नवाब वाजिद अली शाह को कलकत्ता के मटियाबुर्ज के कारावास में भेज दिया गया। इसके बाद वाजिद अली शाह की बेगमहजरत महल ने स्वाधीनता की जंग लड़ी। चिनहट और दिलकुशा में भी उन्होंने अंग्रेजों को एक बार हराया भी। अंतत: बेगम हजरत महल को भी नेपाल में शरण लेनी पड़ी और यहीं 1879 में उनकी मौत हो गई। कहा जाता है वाजिद अली शाह की 300 बीबियां थीं। इनमें से कुछ ने बेगम हजरत महल के साथ जंग में भाग लिया।

1857 की गदर और नवाब की जूतियां

अवध में एक कहावत है। …ज्यादा नवाब न बनो। अमां यार नवाबियत ना झाड़ो। दरअसल, यह कहावत उस किस्से जो जुड़ी है जो नवाब वाजिद अली शाह के बारे में मशहूर है। कहा जाता है 1857 की गदर के समय जब अंग्रेजों ने अवध पर कब्जे के लिए लखनऊ के महल पर हमला किया तब नवाब अपने महल में ही थे। इंग्लिस्तान की भारी फौज की डर से सेवादार महल छोड़कर भाग गए। 300 बीबियां भी इधर-उधर जाकर छिप गयीं। वाजिद अली शाह को अंग्रेजों ने पकड़ लिया। अंग्रेज सिपाहियों ने नवाब वाजिद अली शाह से पूछा-पूरा महल खाली हो गया। सब भाग गए। आप क्यों नहीं भागे। इस पर नवाब साहब ने जवाब दिया-मुझे मेरी जूतियां नहीं मिलीं। उन्हें ढूंढ़कर लाने वाला और पहनाने वाला कोई नहीं था। ऐसे में बिना जूतियों के मैं कैसे भागता। इसलिए बैठा रहा।

मोहब्बतों की लंबी दास्तान

9 साल तक अवध के शासक रहे वाजिद अली शाह ने गदर के समय लखनऊ शहर में 20 हजार मौतों के बाद अपनी गद्दी गवां दी थी। वाजिद अली शाह अपने संगीत प्रेम और मोहब्बतों की दास्तान के लिए जाने जाते थे। भातखंडे संगीत विश्वविद्यालय कभी वाजिद अली शाह का परीखाना हुआ करता था। इस इमारत में शाह की परियां रहती थीं। परी यानी नवाब की बीबियां। जो परी नवाब के बच्चे की मां बनती थी उसे महल कहा जाता था। बेगम हजरत महल भी परी यानी बांदी से बेगम बनी थीं।

खूब लड़ी थीं बेगम हजरत महल

वाजिद अली शाह की गैर मौजूदगी में बेगम हजरत महल परियों और ‘नाचने-गानेवालों’ के साथ अंग्रेजों की फौज से जमकर मुकाबला किया था। लखनऊ के सिकंदरबाग में भीषण कत्लेआम हुआ जिसमें हजारों लोग मारे गए। सिंकदर बाग चौराहे पर वीरांगना ऊदादेवी की मूर्ति लगी है। जो इस बात की गवाह है यहां कितनी भीषण जंग हुई थी।

आठ साल की उम्र में किया पहला सेक्स

वाजिद अली शाह ने अपनी किताब इश्कनामा में खुद लिखा है कि उन्हें औरत और मर्द के रिश्ते का पहला अहसास 8 साल की उम्र में रहीमन नाम की अधेड़ औरत ने करवाया था। यह पुस्तक राजपाल प्रकाशन ने ‘परीखाना’ नाम से छापा है। वाजिद अली शाह ने कुल 60 किताबें लिखीं थीं। वह बहुत बड़े लेखक भी थे। ‘बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए’ जैसी रचनाएं इसकी तस्दीक करती हैं। नवाब ने लगभग 300 शादियां कीं। इनमें से 112 से अधिक निकाह थे। कुछ मुताह थे यानी कुछ समय के लिए की जाने वाली शादी। उन्होंने अरब व्यापारियों की अफ्रीकी गुलाम औरतों से भी निकाह किए। इनमें से कुछ उनकी बॉडीगार्ड भी थीं।

परीखाने में 180 औरतें सिखाती थीं कत्थक

परीखाना में 180 से ज्यादा औरतों को संगीत सिखाने के लिए नौकरी पर रखा गया था। परीखाना की बेगमों, महलों और परियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी महिलाओं की थी। यहां कत्थक की महफिल हमेशा सजी रहती थी। कत्थक में नवाब खुद कृष्ण बनते और उनकी हूर परी और यास्मीन परी गोपियां बनतीं। कत्थक सिखाने वालों को महाराज कहा जाता था। बिंदादीन महाराज से शुरू हुई विरासत बिरजू महाराज तक जाती है।

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